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गौरतलब है कि नरियाना पुल का निर्माण 2009 में शुरू होकर 2011 में पूरा हुआ था, लेकिन महज कुछ वर्षों में ही इसकी हालत खराब हो गई. स्थानीय लोगों का आरोप है कि ओवरलोडेड ट्रकों के लगातार दबाव और निर्माण में घटिया सामग्री के इस्तेमाल ने पुल की उम्र घटा दी. इसी तरह मांगोबंदर पुल भी दरारों के कारण लंबे समय से खतरे में था. करीब नौ साल पहले ही एनएचएआई की टीम ने निरीक्षण कर गार्डर और स्लैब के टूटने की पुष्टि की थी और पुनर्निर्माण का आश्वासन भी दिया था, लेकिन….
जमुई: अगर आप बिहार से झारखंड या पश्चिम बंगाल जाना चाहते हैं. या आप राष्ट्रीय राजमार्ग 333 ए से होकर गुजरने वाले हैं, तो आपके लिए बेहद जरूरी खबर है. विक्रमशिला सेतु के एक हिस्से के टूटने के बाद अब इस रूट पर बने दो पुलों को बंद कर दिया गया है. जमुई जिले के खैरा-सोनो मुख्य मार्ग पर स्थित एनएच-333ए पर बने नरियाना और मांगोबंदर पुल को बुधवार से बंद कर दिया गया है. नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने दोनों पुलों के दोनों छोर पर बैरिकेडिंग लगाकर बड़े वाहनों का आवागमन पूरी तरह रोक दिया है. यह दोनों पुल बिहार-झारखंड को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण रूट पर स्थित हैं, जिससे रोजाना हजारों लोगों की आवाजाही होती थी. अब अचानक लिए गए इस फैसले से यात्रियों और परिवहन चालकों को करीब 30 किलोमीटर लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ेगा.
राहत की बात यह है कि साइकिल और बाइक सवारों के लिए पुल को आंशिक रूप से खुला रखा गया है, ताकि स्थानीय आवाजाही पूरी तरह प्रभावित न हो. एनएचएआई के अधिकारियों ने बताया कि नरियाना पुल की स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. पुल के बीच स्थित एक पिलर के धंस जाने से इसका मध्य भाग बैठ गया है और स्लैब दो हिस्सों में टूट चुका है. पुल के नीचे की प्लेट में दरार पड़ने से सरिया तक बाहर आ गया है और निचले हिस्से से सीमेंट झड़ने लगा है. हालत यह है कि वाहनों के गुजरने पर पुल में तेज कंपन महसूस किया जा रहा था, जो किसी बड़े हादसे का संकेत था. वहीं मांगोबंदर पुल में भी वर्षों पहले दरारें आ चुकी थी और उसकी संरचना भी कमजोर हो गई थी. दोनों पुलों की जर्जर हालत को देखते हुए आखिरकार विभाग को कड़ा फैसला लेना पड़ा. सहायक अभियंता रामप्रवेश चौधरी ने बताया कि फिलहाल दोनों पुलों को सुरक्षा कारणों से बंद किया गया है और जल्द ही डाइवर्जन बनाने पर विचार किया जा रहा है.
छह साल ही टिक सका था यह पुल
गौरतलब है कि नरियाना पुल का निर्माण 2009 में शुरू होकर 2011 में पूरा हुआ था, लेकिन महज कुछ वर्षों में ही इसकी हालत खराब हो गई. स्थानीय लोगों का आरोप है कि ओवरलोडेड ट्रकों के लगातार दबाव और निर्माण में घटिया सामग्री के इस्तेमाल ने पुल की उम्र घटा दी. इसी तरह मांगोबंदर पुल भी दरारों के कारण लंबे समय से खतरे में था. करीब नौ साल पहले ही एनएचएआई की टीम ने निरीक्षण कर गार्डर और स्लैब के टूटने की पुष्टि की थी और पुनर्निर्माण का आश्वासन भी दिया था, लेकिन पुल के क्षतिग्रस्त हुए नौ साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी काम शुरू नहीं हो सका. अब दोनों पुलों के एक साथ बंद होने से न केवल यातायात व्यवस्था चरमरा गई है, बल्कि नदी पार के दर्जनों गांवों के लोगों की परेशानी भी बढ़ गई है. स्थानीय लोग अब जल्द वैकल्पिक व्यवस्था और नए पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं, ताकि इस अहम मार्ग पर फिर से रफ्तार लौट सके.
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